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ढोला –मारु की प्रेम कहानी । Dhola maru ki prem kahani

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 ढोला – मारु की प्रेम कहानीDhola maru ki prem kahani 

 

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नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अमर और मेरे ब्लॉगहिन्दी शायरी ऐक्सप्रैस 2022” में आपका स्वागत है । आशा है कि आप सभी अपने-अपने काम में व्यस्त होंगे । आज हम ढोला –मारु की प्रेम कहानी के बारे में  जानेंगे जिसके संगीत भारत के राजस्थान में ही नही बल्कि पुरे भारत में एक प्रेम कहानी से भारतीय संस्कृति के रुप में कैसरीया बालम प्धारो नी म्हारे देश नाम के लोकगीत को जन्म दिया ।

 

ढोला –मारु की प्रेम कहानी । Dhola maru ki prem kahani । Dhola - Maru's love story.
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    परिचय

    सम्वत 978 में अजमेर जिले के बाखेरा गांव में ढोला और मारु की शादी हुई लेकिन ढोला –मारु के दोहों में तो मारु का इंतजार और दर्द छलकता है । अब सवाल यह आचा है कि जब ढोला और मारु की शादी ही हो गई थी तो आखिर मारु के दर्द की वजह क्या थी ?

    ढोला –मारु के प्यार की कहानी की शुरुआत 11 शताब्दी में होती है जब पश्चमी राजस्थान का महत्वपूर्ण शहर बीकानेर जांगल प्रदेश के नाम से जाना जाता था । वह जांगल प्रदेश जहां हर तीसरे साल अकाल और हर आठवें साल में भयानक अकाल पङता था जिसे पूर्ण अकाल का नाम दिया गया था । जांगल के सूखे और अकाल से परेशान होकर लोग मालवा की और चले जाते थे , मालवा हरा –भरा और पानी से सराबोर इलाका था । कुछ समय जांगल के लोग मालवा में ही रहकर अपना गुजर-बसर करते थे और जब जांगल में बरसात होती तो जांगल में अपने-अपने ठिकानों पर लौट आते थे ।

     ऐसे ही एक अकाल के दौरान जांगल प्रदेश के पुंगल ठिकाने के राजा पिंघल अपने परिवार और पशुओ को लेकर मालवा की तरफ रवाना हुए और अपने प्रिय मित्र राजा नल के पास पहुंचे । राजा नल मालवा के नरवलगढ ठिकाने पर राज किया करते थे और उन्होने अपने दोस्त की खूब मान-मनुहार की । दोनों राजाओं ने काफी लम्बा समय एक साथ बिताया और मजे-मजे में दिन कब गुजर गये पता ही नही चला ।

    कहते हैं कि दोनों राजा एक दिन बातचीत में व्यस्त थे तब राजा पिघंल के पास एक संदेशा आता है जिसमें लिखा था कि बरसात हो गई है और अब आपके राज्य के लोग आपका इंतजार कर रहे हैं ।

     

    ढोला –मारु का बचपन में विवाह

    बरसात का संदेशा पाकर राजा पिंघल ने राजा नल से विदाई लेनी चाही लेकिन राजा नल यह नही चाहते थे कि उनका प्रिय दोस्त अपने राज्य मे जाकर उनको भूल जाए इसलिए अपनी पक्की यारी को अपनी रिश्तेदारी में बदलने की तैयारी करते हैं और अपने तीन साल के बेटे साल्या कुमार की शादी राजा पिंघल की डेढ साल की बेटी मरवणी से तय कर देते हैं । साल्या कुमार का प्यार का नाम ढोला था और मरवणी को सब प्यार से मारु कह कर बुलाते थे । यहीं से दोनों का रिश्ता जुङता है । ढोला-मारु के विवाह को लेकर राजस्थानी में एक दोहा कहा जाता है कि-

    तोरण कर क्या तीन सौ,

    चंवरी पदम पचास,

    नौ सो मण मिर्ची लगी,

    अन्न का करो विचार ।।

    दोहे में बताया गया है कि ढोला-मारु की शादी में उस वक्त सौ मण मिर्ची खर्च हुई थी और अनाज का तो कोई ठिकाना ही नही था  । ढोला-मारु की शादी का भोज कई दिनों तक चला था । राजा नल और राजा पिंघल ने अपने बच्चों की शादी बहुत धुमा- धाम से की थी लेकिन यह एक बाल विवाह था इसलिए दुल्हन अपने ससुराल नही गई बल्कि अपने पिता के साथ पुंगल फिर से लौट आई ।

     

    मारु द्वारा ढोला का इंतजार

    मारु को बचपन से ही यह बता दिया था कि जब वह जवान होगी तो उसका पति उसे लेने जरुर आएगा । मारु ढोला का इंतजार कर रही थी लेकिन समय ने करवट ली और ढोला के पिता राजा नल का देहांत हो गया । अब ढोला जवान हुआ और एक प्रतापी राजा भी बन गया परंतु अपनी बचपन में हुई शादी के बारे में सबकुछ भूल गया । ढोला ने मालवा के दुसरे ठिकाने की एक राजकुमारी मालवणी से शादी कर ली । अपनी शादी के बाद ढोला राज-काज मे बहुत व्यस्त हो गया और ढोला और मालवणी दोनों खुशी से अपना वक्त व्यतीत करने लगे लेकिन इस बात से बैखबर मारु अब भी ढोला की इंतजार कर रही थी ।

     

    राजा पिंघल का ढोला को संदेश

    पुरानी समय से राजस्थान की एक रीति रही है कि एक बार जो शादी हो गई तो सारी उम्र उसी को ही निभाया जाता है फिर चाहे जो हो जाए इसलिए अपनी बेटी के जवान होते ही राजा पिंघल ढोला को एक  संदेश भेजा कि मारु अब जवान हो गई है और ढोला आकर मारु को अपने साथ ले जाए । यह संदेश  लेकर जब दूत नरवलगढ पहुंचा तो ढोला नरवलगढ में नही था और यह संदेश रानी मालवणी के हाथ लग गया । संदेश को पढते ही रानी को ढोला की पिछली शादी के बारे में सब कुछ पता चल गया तो रानी मालवणी ने अपनी तरफ से एक दूत भेजकर ढोला की पिछली रानी मारु के बारे में सबकुछ पता लगाया ।  

     

    रानी मारु की खूबसुरती

    रानी का दूत जब पुंगल पहुंचा तो मारु की खूबसुरती को देखकर दंग रह गया और रानी का दूत जब वापिस नरवलगढ आया तो मालवणी ने दत से मारु की खूबसूरती के बारे में पूछा की मारु कैसी दिखती है तो दूत ने एक दोहा कहा –

    गति गंगा मति सरसती,

    सीता सील सुभाई ।

    महिलां सरहर मारुई,

    अवर ना दुजी काइ ।।

    दोहे का अर्थ है कि मरवणी गती में गंगा और बुद्धि मे सरस्वती और स्वभाव में सीता जैसी विनम्र है । दुनिया की कोई दुसरी महिला मरवणी की खूबसुरती और बुद्धि की ब्रराबरी नही कर सकती ।

    दूत की बातें सुनकर मालवणी घबरा जाती है और उसने अपने सभी सैनिकों को आदेश दिया कि राजा पिंघल का  कोई भी संदेश ढोला के हाथ नही लगना चाहिए । अब राजा पिंघल बार-बार अपने दूत भेजते और मालवणी के सैनिक उन दूतों को बीच रास्ते में ही मार डालते । इधर अपने ढोला के इंतजार में मारु ने खाना-पीना तक बंद कर दिया था और वह दिन पर दिन कमजोर होती चली गई इससे मारु की चैहरे की चमक खोने लगी थी ।

     

    राजा पिघंल द्वारा (ढोली) दूत का संदेश भेजना

     अपनी बेटी का हाल देख कर राजा पिंघल ने एक दुसरा रास्ता अपनाया । राजा पिंघल ने एक चतुर (ढोली) दूत को नरवलगढ भेजने का फैसला किया । दूत मे खुद यह वादा किया कि या तो वह मारु का संदेश ढोला तक पहुंचा देगा नही तो अपने राजा को अपना मुंह नही दिखाएगा । मारु नें अपने संदेश में ढोला के लिए दोहे लिखकर दिये और कहा कि यह दोहे किसी भी तरीके से ढोला को सुना देना ताकी ढोला को अपनी पहली शादी के बारे में सबकुछ याद आ जाए और ढोला मारु को लेने पुंगल आ जाए । मारु ने अपने दोहों में लिखा था कि अगर सावन से पहले ढोला नही आया तो मारु अपनी जान दे देगी । (ढोली) दूत मारु का संदेश लेकर नरवलगढ की तरफ निकलता है और अपना भिखारी का वेश बना लेता है । रास्ते में रानी मालवणी के सैनिकों ने (ढोली) दूत को रोका लेकिन भिखारी समझकर छोङ दिया । इस प्रकार (ढोली) दूत सैनिकों को चकमा देकर राजा ढोला के महल में जा पहुंचता है ।

     

     

    राजा ढोला को मारु का संदेश

     राजा ढोला के महल के बाहर जाकर (ढोली) दूत मारु को दोहों को मलहार राग में गाने लगा । (ढोली) दूत को भिखारी के वेश मे सुंदर दोहों की आवाज सुनकर राजा ढोला ने (ढोली) दूत को अपने महल में बुलवाया और (ढोली) दूत से यहां आने का कारण पूछा तो (ढोली) दूत ने राजकुमारी मारु के दोहों को गाते हुए साफ शब्दों में राजा को मारु का संदेश सुनाया । राजा ढोला नें दोहों से मारु की खूबसुरती और विरह का संदेश सुना तो अपनी पिछली शादी की सारी बातें को याद करने लगा और (ढोली) दूत के साथ अपना संदेश भिजवाया की वह मारु को लिवाने जल्द से जल्द आ रहा है ।

    अब ढोला के आने की खबर सुनते ही मारु खुशी से झूम उठी और अपने आप को निखारने में व्यस्त हो गई । अगले ही दिन राजा ढोला तैयार हो कर अपनी मारु को लेने के जैसे ही राज्य से निकलने लगा तो दुसरी रानी मालवणी ने कोई बहाना बना कर रोक लिया । अब राजा ढोला जब भी मारु को लिवाने के लिए तैयारी करते तो दुसरी रानी मालवणी कोई ना कोई बहाना बना कर उन्हे रोक ही लेती

     

    राजा ढोला का पुंगल प्रस्थान

    मालवणी की इस बात से परेशान होकर ढोला एक दिन बहुत ही तेज चलने वाले ऊंट पर सवार होकर राजा पिंघल के राज्य पिंघल में मारु को लिवाने पहुंच ही जाते हैं । मारु की खूबसुरत देख ढोला हैरान हो गये और अपनी ससुराल पुंगल में मारु के साथ कई दिन बीताये । कई दिन बाद ढोला ने राजा पिंघल से अपने राज्य नरवलगढ मारु को ले जाने की आज्ञा मांगी । राजा पिघंल से आज्ञा लेकर ढोला और मारु नरवलगढ की तरफ चल निकले

     

    उमरा-सुमरा से सामना

    ढोला मारु का रास्ते में उमरा-सुमरा नाम के एक ठग से सामना हुआ । उमरा चाहता था कि वह ढोला को मारकर गजब की सुंदर मारु को हासिल कर ले । अपने ठगी के उद्देश्य से उमरा ने रास्ते में जाजम बिछा दिया और ढोला से थोङी देर रुकने की मनुहार करने लगा । राजस्थान मे शादी –विवाह में अमल (अफीम) से मनुहार करने की परम्परा राजा –महाराजाओं के समय से ही रही है । अब ढोला उमरा से बार -बार मनुहार की बात सुनकर अपने ऊंठ से उतरकर उमरा के साथ अमल (अफीम) की मनुहार लेने लगा जबकि मारु ऊंठ पर ही बैठी थी ।

     

    मारु द्वारा राजा ढोला के प्राणों की रक्षा

    मारु को उमरा द्वारा बार-बार मनुहार की बात करनी अजीब लगी इस लिए मारु को उमरा पर ठग होने का शक हो गया और ढोला के ऊंठ से उतरने के कारण मारु और भी सचेत हो गई । मारु ने गौर किया की उमरा ढोला अपने से दोगुनी मात्रा में अमल(अफीम) सेवन करवा रहा है और खुद बहुत ही कम अफीम का सेवन कर रहा है तो मारु ने खतरा भांप कर ऊंट को जोर से एङी मारी और एङी की मार से ऊंट एकदम से भागने लगा तो ऊंट को रोकने के लिए ढोला ऊंट के पीछे-पीछे दौङने लगा । ऊंट के पीछे दौङते हुए जब ढोला कुछ दुर आ गया तो मारु में ढोला को आवाज की जल्दी ऊंट पर चढो हमारी जान को खतरा है । ढोला के ऊंट पर चढने के बाद ऊंट सीधा नरवलगढ आकर ही रुका ।

     

    नरवलगढ में ढोला-मारु का सत्कार

    नरवलगढ आने पर दोनों का खूब सत्कार किया गया और मालवणी ने भी रास्ते में ठगों से राजा ढोला की रक्षा में मारु की चतुराई देखकर मारु को स्वीकार कर लिया । मारु-ढोला की रानी बनकर अपना वक्त गुजारने लगी । जब से आज तक ढोला –मारु के गीतों और दोहों को गाया जाता है ।

     

     दोस्तों उम्मीद करता हूँ कि मेरे द्वारा दी गई ढोला –मारु की प्रेम कहानी संबधित जानकारी आपको पसंद आई होगी और आपको ढोला –मारु की प्रेम कहानी के जीवन को लेकर  सभी सवालों का उतर मिल गया होगा । अगर आपको मेरे द्वारा दी गई जानकारी अच्छी लगी तो कृपया ब्लॉग “ हिन्दी शायरी ऐक्सप्रैस ” को Follow करना ना भूलें ।

     

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    ढोला –मारु की प्रेम कहानी । Dhola maru ki prem kahani Reviewed by Amar Tech News on मार्च 21, 2022 Rating: 5

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    Dear friend thanks for visit my blog
    Good Luck.

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